

नजूल भूमि पर महापौर का महानिर्माण, एचआरडीए हो रहा मेहरबान!
आम जनता पर सील और नोटिस का चाबुक, महापौर के निर्माण पर खामोश क्यों है सिस्टम?
रुड़की। शहर में अवैध निर्माणों पर कार्रवाई के नाम पर आम लोगों को नोटिस और सीलिंग की मार झेलनी पड़ रही है, लेकिन जब बात सत्ता के गलियारों से जुड़े लोगों की आती है तो नियम-कानून मानो दम तोड़ देते हैं। ऐसा ही मामला शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां सिविल लाइंस क्षेत्र मेंनजूल भूमि पर महापौर के निर्माण को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं और एचआरडीए की भूमिका भी कटघरे में दिखाई दे रही है। शहर के लोगों का कहना है कि एचआरडीए छोटी-सी दुकान, मकान या निर्माण पर तत्काल नोटिस जारी कर देता है। कई मामलों में तो भवनों को सील तक कर दिया जाता है। लेकिन महापौर से जुड़े बताए जा रहे निर्माण पर विभाग की चुप्पी लोगों के गले नहीं उतर रही। चर्चा है कि नजूल भूमि पर ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी हो गईं, लेकिन न तो कोई नोटिस जारी हुआ और न ही किसी प्रकार की कार्रवाई दिखाई दी। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि यही निर्माण किसी आम नागरिक द्वारा किया गया होता तो अब तक बुलडोजर और सीलिंग की कार्रवाई हो चुकी होती। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नियम सिर्फ आम जनता के लिए हैं? क्या प्रभावशाली लोगों के लिए अलग कानून लागू होते हैं?
शहर में यह मामला तेजी से चर्चा का विषय बनता जा रहा है। लोग सोशल मीडिया से लेकर चौराहों तक एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर एचआरडीए की नजर इस निर्माण पर क्यों नहीं पड़ी? या फिर नजर पड़ने के बावजूद विभाग ने आंखें मूंद रखी हैं? विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठानी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि यदि निर्माण नियमों के अनुरूप है तो विभाग सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करे और यदि अनियमितता है तो फिर वही कार्रवाई होनी चाहिए जो आम नागरिकों पर की जाती है। अब सबकी निगाहें एचआरडीए और प्रशासन पर टिकी हैं। देखना होगा कि विभाग इस मामले में पारदर्शिता दिखाता है या फिर सवालों के घेरे में खड़ी अपनी कार्यप्रणाली पर चुप्पी साधे रखता है। फिलहाल शहर में चर्चा यही है कि “आम आदमी के लिए कानून सख्त, लेकिन रसूखदारों के लिए राहत” आखिर कब तक चलेगी?